मंगलवार, 4 अगस्त 2015

खोखला समाज

मैं संत्रस्त हूं
भारत के आज से
इस खोखले समाज से
आने वाला कल मुझे बहुत डराता है
क्यों आज इंसान एक-दूसरे का घर जलाता है।

मैं संत्रस्त हूं
देश के रखवालों से
रिश्वत के दलालों से
जाने कितने खूनी खेल ये खेलते हैं
देख कर खून के धब्बे उफ तक नहीं करते हैं।

मैं संत्रस्त हूं
भारत की राजनीति से
नेताओं की नीति से
वोट बैंक की नीति इन्हें खूब रास आती है
इनके हर बात में राजनीति की बास आती है।

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

पैसा

मरना तो आसान होता है, जीना आसान नहीं होता
यदि पैसा हो पास तो कोई भी अनजान नहीं होता
टूट जाते हैं सब रिश्ते जब हम गरीब होते हैं
अगर पैसा रहे पास तो सब करीब होते हैं।

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

लाचार व्यक्ति

सड़क के चौराहे पर
एकतरफ थी बहुत भीड़-भार
वंही दूसरी तरफ कोने में
खड़ा था एक व्यक्ति लाचार
खुद को छिपाता हुआ
भीड़ से खुद को बचाता हुआ।

मैं बढ़ा उस भीड़ की तरफ
अपनी जिज्ञासा लिए
जायजा लेने हालात का
आखिर ये भीड़ कैसी
झगड़ा है किस बात का
अचानक उस भीड़ से निकला
एक व्यक्ति ये कहते
' ये धरती हमारी है, मारो उसे जो बिहारी है '।

मैं छुब्द था देखकर
इन लोगों की हंसी को
दूसरी और कोने में खड़े
उस शख्स की बेबसी को
खुद को बचाने की जद्दोजहद में
घिरा था वो इंसान
क्या वाकई ये लोग
ले लेंगे उसकी जान।

पर क्यों हो रहा है
कुछ लोगों के साथ ये व्यवहार
क्या सिर्फ इसलिए की
उनकी जन्म भूमि है बिहार ।

बहुत ही बेहुदे हैं वो लोग
जो पहुंचा रहे हैं
इसी देश के निवासी को चोट
क्या अपने ही देश में रहने का
इन्हें हक नहीं है
क्या भारत बिहार का राज्य नहीं है ?

बहुत शर्मनाक है ये
जो इस देश के रहने वालों पर
इस तरह अत्याचार हो
और देश की सरकार
चुपचाप बैठी लाचार हो।

यही सरकार बांग्लादेशियों को
देश की नागरिकता दिलाती है
इनके विषय पर शोर मचाती है
लेकिन अपनों के वक्त में
गूंगी हो जाती है।

क्या सफेद पोशाक धारियों से
इन लोगों की करुणा देखी नहीं जाती
या फिर देश के कुछ गरीब और
बिहारी के नाम पर उनसे
राजनीती की रोटी सेकी नहीं जाती।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मैं बेटी हूं...

न मैं दुनिया में आई थी,
न अपनी आंखें खोल पाई थी
फिर भी मृत्यु शैय्या पर लेटी हूँ
क्यों, क्योंकि मैं बेटी हूं?

जबकि उत्तम कर्म मेरा है
फिर क्यों मुश्किल जन्म मेरा है
वो जो मां की गोदी में लेटा है
इसलिए की वो बेटा है?

दुख जो मां-बाप को देता है
और नहीं कोई, वो बेटा है
सुख मां-बाप को जो पहुंचाती
जन्म नहीं है वो ले पाती।

क्यों अब भी अभिशाप है बेटी
क्यों आखिर मां जन्म न देती
खुशी मनातें हैं सब लोग
जब जन्म लेता है बेटा
और जन्म जो ले ले बेटी
पिता कंही उदास है लेटा।

रविवार, 28 नवंबर 2010

डीडीए फ्लैट्स

आजकल हर तरफ है दिल्ली में डीडीए फ्लैट्स का शोर
हर कोई फ्लैट्स खरीदने के लिए कर रहा है जोड़-तोड़
कोई निकाल रहा है अपनी जिन्दगी भर की कमाई
तो किसी ने लोन के लिए है अर्जी लगाई

हर किसी को है इंतजार आखिर कब निकलेगा ड्रॉ
सिंगल ही सही लेकिन अपना एक घर हो
हर कोई देख रहा है खुली आंखों से सपना
हे भगवान इनके सपनो को बचाए रखना


क्या भ्रष्ट अफसरों से बच पाएगा सपना इनका
वो अफसर जिन्हें कोई परवाह नहीं किसी के जीने मरने से

वो क्या करेंगे इनके सपनों की परवाह
जिन्हें सिर्फ मतलब है अपनी जेब गर्म करने से।


पता नहीं क्या होगा इसका परिणाम
लेकिन तय है रंगीन होगी अफसरों की शाम
हो सकता है सामने आए एक और घोटाला
और निकल जाए लाखों लोगों के सपनो का दिवाला ।

घोटाला सामने आते ही सरकार गंभीरता दिखाएगी
मामले की जांच तेजी से कराएगी
कुछ दिन बाद तेजी से हो रही जांच डी-रेल हो जाएगी
बड़ी मछलियां आजाद घूमेंगी और छोटी को जेल जाएगी।

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

क्या हुआ जो प्रिय तुम मेरी नहीं

क्या हुआ जो प्रिय तुम मेरी नहीं
पर मैं तो सिर्फ तुम्हारा हूं।

तुम न अपनाओ गिला नहीं
इंसान मैं बड़ा ही प्यारा हूं
समझूंगा की तुम लहरें हो
और मैं सिर्फ किनारा हूं
क्या हुआ जो प्रिय तुम मेरी नहीं
पर मैं तो सिर्फ तुम्हारा हूं।

जो दे न सकी तुम हाथ मुझे
तो कम से कम कुछ साथ ही दो
जो बन न सकी जीवन मेरी
तो जीने का अहसास ही दो
क्या हुआ जो प्रिय तुम मेरी नहीं
पर मैं तो सिर्फ तुम्हारा हूं।

हृदय रहा मेरा पाक सदा
तुम्हें पाने की कभी चाह न की
बेशक कितने ही कष्ट सहे
पर मूंह से कभी भी आह न की
क्या हुआ जो प्रिय तुम मेरी नहीं
पर मैं तो सिर्फ तुम्हारा हूं।

दुःख मैंने तुमको दिए बहुत
हो सके तो करना माफ प्रिय
मेरी भी कुछ मजबूरी थी
वरना है दिल मेरा साफ प्रिय
क्या हुआ जो प्रिय तुम मेरी नहीं
पर मैं तो सिर्फ तुम्हारा हूं।

मैंने माना है लहर तुम्हें
और खुद को माना किनारा है
मिलती रहना तुम कभी-कभी
तुम बिन न कोई सहारा है
क्या हुआ जो प्रिय तुम मेरी नहीं
पर मैं तो सिर्फ तुम्हारा हूं।

संभव ही नहीं पाना तुमको
मैं योग्य तुम्हारे हूं ही नहीं
मैं बदबख्त बहुत हूं प्रिय
मैं तो खुशियों के योग्य नहीं
क्या हुआ जो प्रिय तुम मेरी नहीं
पर मैं तो सिर्फ तुम तुम्हारा हूं।

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

मैं भारत हूं



मैं भारत हूं
लोकतंत्र की सबसे बड़ी इमारत हूं
धर्मनिरपेक्षता का किला हूं
कई विविधताओं से मिला हूं।

मेरी ऊंचाई विवादास्पद है
क्योंकि यंहा की राजनीती हास्यास्पद है
अब नहीं रहा मैं लोकतंत्र
बन गया हूं अब मैं गन-तंत्र।

आज मेरे अन्दर अजब सा शोर है
मुझे बनाने वाला कई नेता चोर है
बन गया हूं आज मैं थीएटर
जहां बैठा है गुंडा और फ़िल्मी एक्टर।

मैं बन गया हूं राजनीती के खेल का मैदान
जिसमे खेलने वाला हर कोई है बेईमान
हर कोई अपने स्वार्थ के लिए खेलता है
यंहा सवाल पूछने के पैसे वसूलता है।

मेरे मन में है आज एक भयानक सा डर
मुझे गैरों से ज्यादा है अपनों से डर
मारना चाहा जिसने मुझे नोट के लिए
मेरे रखवालों ने उसे छोड़ना चाहा वोट के लिए।

मुझे बना दिया है डब्ल्यूडब्ल्यूई का रिंग
जहां नेता आपस में करते हैं फाइटिंग
अब नहीं यंहा देश के हित की बात होती है
न जाने कितनी बार संसद की कार्यवाही बर्खास्त होती है।

मेरी करुणा को नितेश ने अपनी कविता में उतरा है
जागो भारत के लोगों मुझे तुम्हारा ही सहारा है
डूब रहा हूं मैं मुझे किनारा चाहिए
बचा लो मुझे गिरने से मुझे सहारा चाहिए