संदेश

मैं भारत हूं

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मैं भारत हूं लोकतंत्र की सबसे बड़ी इमारत हूं धर्मनिरपेक्षता का किला हूं कई विविधताओं से मिला हूं। मेरी ऊंचाई विवादास्पद है क्योंकि यंहा की राजनीती हास्यास्पद है अब नहीं रहा मैं लोकतंत्र बन गया हूं अब मैं गन-तंत्र। आज मेरे अन्दर अजब सा शोर है मुझे बनाने वाला कई नेता चोर है बन गया हूं आज मैं थीएटर जहां बैठा है गुंडा और फ़िल्मी एक्टर। मैं बन गया हूं राजनीती के खेल का मैदान जिसमे खेलने वाला हर कोई है बेईमान हर कोई अपने स्वार्थ के लिए खेलता है यंहा सवाल पूछने के पैसे वसूलता है। मेरे मन में है आज एक भयानक सा डर मुझे गैरों से ज्यादा है अपनों से डर मारना चाहा जिसने मुझे नोट के लिए मेरे रखवालों ने उसे छोड़ना चाहा वोट के लिए। मुझे बना दिया है डब्ल्यूडब्ल्यूई का रिंग जहां नेता आपस में करते हैं फाइटिंग अब नहीं यंहा देश के हित की बात होती है न जाने कितनी बार संसद की कार्यवाही बर्खास्त होती है। मेरी करुणा को नितेश ने अपनी कविता में उतरा है जागो भारत के लोगों मुझे तुम्हारा ही सहारा है डूब रहा हूं मैं मुझे किनारा चाहिए बचा लो मुझे गिरने से मुझे सहारा चाहिए

मेरी मां

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उस रात चैन से न सोई थी मां मुझे विदा करते वक्त रोई थी मां अक्सर मेरी आंख भर आती है जब भी मां मुझे याद आती है निकला था मजबूरी में घर छोड़ कर मैं पैसा कमाने बीमार पिता की चिंता और मां की लाचारगी मिटाने जब भी मेरी फोन पर मां से बात होती है घर की परेशानियों को लेकर मां उदास होती है अच्छा नहीं लगता है मां का यूं उदास होना सबसे नजरें बचाकर घर के किसी कोने में रोना आज भी कोई कमी नहीं आई है मां के प्यार में तरसती हैं उसकी नाम आंखें मेरे आने के इंतजार में जब जाए मिलने मां से तो मिलना हंस कर नितेश वरना मां सोचेगी की परदेश में बेटा खुश नहीं है अब तो बस एक ही हसरत है कि बेटा होने का फर्ज निभाऊं मैं कमाकर जल्द ही ढेर सा पैसा घर का कर्ज उतारूं मैं।

मोबाइल की चाहत

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हां एक मोबाइल चाहिए मुझे मोबाइल की कमी खूब खलती है तब तकलीफ होती है मुझे जब मोबाइल की घंटी बजती है बिना मोबाइल कॉलेज जाना अच्छा नहीं लगता है कॉलेज में हर कोई मोबाइल से बात करता है इसी कारण लड़कियों से मैं दोस्ती नहीं करता हूं बहुत आता है क्रोध जब अपने दोस्तों से पीसीओ से बात करता हूं नाम तो मेरा 'नितेश' है पर नित-ऐश नहीं है मोबाइल ले तो मैं भी लूं पर जेब में कैश नहीं है हर महीने पिता जी भेजते हैं पांच सौ रुपये मोबाइल की चाहत में अब इन पैसों में ही बचत करता हूं अब चेहरे पर मेरे आती है स्माइल कि अगले साल मैं निश्चय ही ले लूंगा मोबाइल।

खुशी भी और गम भी

बहुत लंबे समय से मैं कुछ लिख नहीं पा रहा था। दरअसल पिछले दो-तीन महीनों से मैं अपने भविष्य और करियर बनाने की जद्दोजहद में लगा हुआ था। दो महीने अमर उजाला में इन्टर्न किया। इन्टर्न के दौरान ही टेस्ट दिया जिसमे पास भी हुआ, पास होने की खुशी भी हुई और थोड़ी निराशा भी। दरअसल अनुवाद में एक छोटी सी गलती की वजह से मुझे जूनियर सब-एडिटर से ट्रेनी सब-एडिटर बना दिया गया। पहले तो इस बात से निराशा हुई। इसके बाद ये जान कर कि मुझे अलीगढ़ भेजा जा रहा है, एक बार फिर निराशा हुई। बचपन से जिस दिल्ली में रहा, जिस दिल्ली में बड़ा हुआ, जिस दिल्ली में लोग दूसरे शहरों से आते हैं मुझे उसी शहर को छोड़कर जाना था, निराशा थी लेकिन करियर को ध्यान में रखकर मैं जॉइन करने 20 अप्रैल 2010 को अलीगढ़ आ गया। किताबों में पढ़ा था अलीगढ के बारे में, यहां के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बारे में। किस्मत ने इस शहर में रहने का मौका भी दिया। यहां आए हुए अब मुझे दो महीने से अधिक हो चुके हैं लेकिन आज भी मैं यहां अपने आपको असहज महसूस कर रहा हूं। यहां मुझे बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। लोग जिसे तालीम और तहजीब का शहर कहते...

खून का रिश्ता

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आया कैसा कलयुग देखो मानव मतलब वाला है, जाने किस माया में आकर खूं ममता का कर डाला है। जिसने तुझको जन्म दिया है जिसने तुझको पाला है पर नारी के खातिर तुने मां-बाप को घर से निकाला है साथ दिया तूने पत्नी का दूध का रिश्ता तोड़कर खून किया तूने ममता का हाथ मां-बाप पर छोड़ कर। जाने तूं कैसा निर्दयी है कैसा फ़र्ज़ निभाता है पूछे बात मां- बाप जो कोई तूं सीना छलनी कर जाता है। तुझसे तो बेहतर कुत्ता है रोटी का फ़र्ज़ निभाता है मारे कितना मालिक फ़िर भी सदा ही दुम हिलाता है। रोटी का संबंध है उसका सदा ही साथ निभाता है पालनकर्ता की रक्षा को अपना खून बहाता है। है खून का रिश्ता तेरा फिर भी न साथ निभाता है पत्नी के कारण उनसे तूं रोटी का संबंध हटाता है।

मां

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मैंने पाया इस दुनिया में होती है सबसे प्यारी मां होते हैं वो किस्मत वाले होती है पास में जिनके मां। मां से तुमको ये जान मिली मां से तुमको पहचान मिली मुश्किल है जीवन मां के बिना मां से ये जीवन दान मिली। वो मां ही तो थी जिसने बच्चे से है तुम्हें बड़ा किया गिरते थे जब तुम बचपन में मां नें ही तुमको खड़ा किया। मां नें तुम्हारे खातिर जानें कितने ही कष्ट सहे होंगे सहकर इतने कष्टों को भी दुर्वचन कभी न कहें होंगे न जानें कितनी ही रातें वो तुम्हारे खातिर जागी होगी इस दुनिया की कितनी सुविधा तुम्हारे लिए त्यागी होगी। तुम्हे देख कभी वो पीड़ा में कितनी व्याकुल होती होगी चेहरे पर हंसी देखने को कितनी आकुल होती होगी। अब वक्त तुम्हारा आया है सोचो मां ने क्या पाया है जिसने तुमको दी खुशी सदा उसको ही तुमने रुलाया है।

गरीब

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मैं जानता हूं औरों की तरह तुम भी, मेरी दशा देख मुस्कुरा रहे हो। मेरी लाचारगी दोस्तों को दिखा, मेरा तमाशा बना रहे हो। पर ये क्या, तुम जा रहे हो ? ठहरो कि मैं तुम्हे और हंसाता हूं, तुम्हें अपना परिचय कराता हूं। मेरे घर वाले मुझे बदनसीब और दुनिया वाले शायद गरीब कहतें हैं। गरीब इसलिए, क्योंकि, मैं नहीं कर पाता अपने परिवार का जीविकोपार्जन। बदनसीब इसलिए, क्योंकि , मैं नहीं भर पाया अपने भूखे बच्चों का पेट। जो भूख से तड़पते, चढ़ गए मौत की भेंट असंख्य भारतीय की तरह , वह मेरी भी करीबी है। और जिसने मेरी ऐसी दशा की है, वह गरीबी है। शायद तुम देख पाए सिर्फ़ , मेरे थोड़े से बदन को ढ़कते , मेरे फटे पुराने वस्त्र को पर नहीं देख पाए तुम मेरे भूखे पेट को, जो खाने के इंतज़ार में है बैठा हुआ। शायद नहीं देख पाए तुम , कमजोरी से दबे हुए मेरे गाल को मेरी लड़खड़ाती चाल को। पर तुम कैसे समझोगे हमारी करुणा, तुम भी होगे उन धनि लोगों की तरह , जो गरीब को देख मुस्कुराते हैं। हम खाने के इंतज़ार में कुत्ते की मौत मरते हैं, ...